अब कहाँ रहती है ख़बर ज़माने की।
शायद उम्र है मोहब्बत हो जाने की।।-VAIBHAVRV
©merelafzonse
Thursday, August 29, 2019
Wednesday, August 28, 2019
हसरत
थाम के जी लूँ तुझे इतनी सी हसरत है।
ए ज़िन्दगी चल कोई ऐसा वादा करलें।।
जहां गुज़रें न कभी थे साथ तेरे।
अब उन गलियों में रास्ता करलें।।-VAIBHAVRV
©merelafzonse
Tuesday, August 20, 2019
किरदार
यादो में याद रखना, अपनी बातों में याद रखना।
रहे न रहे कल हम इस जहाँ में, हो सके तो ज़िंदगी की कहानी में एक किरदार हमारे नाम का याद रखना।।- VAIBHAVRV
Saturday, August 17, 2019
Friday, August 16, 2019
भवानीप्रसाद मिश्र जी का जीवन परिचय
विधाएँ : कविता, निबंध, संस्मरण, बाल साहित्य
मुख्य कृतियाँ
कविता संग्रह : गीतफरोश, चकित है दुख, गांधी पंचशती, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, त्रिकाल संध्या, व्यक्तिगत, परिवर्तन जिए, अनाम तुम आते हो, इदं न मम, शरीर कविता फसलें और फूल, मान-सरोवर दिन, संप्रति, अँधेरी कविताएँ, कालजयी, नीली रेखा, तूस की आग, ये कोहरे मेरे हैं, दूसरा सप्तक (छह अन्य कवियों के साथ कविताएँ संकलित)
बाल साहित्य : तुकों के खेल
संस्मरण : जिन्होंने मुझे रचा
निबंध : कुछ नीति कुछ राजनीति
अनुवाद : हेलेन केल्लर : मुक्तद्वार – रवींद्र की कविताएँ, स्टेंड बैक रेडपोनी, पूजागीत : एक चिंतन (रवींद्रनाथ के 54 गीतों का अनुवाद), एंटीगॉनी (सोफोक्लीज के नाटक का पद्यानुवाद)
संपादन : संपूर्ण गांधी वांङ्मय, कल्पना (साहित्यिक पत्रिका), विचार (साप्ताहिक), आज के लोकप्रिय कवि श्रृंखला में : बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की कविताएँ, महात्मा गांधी की जय (श्री मन्नारायण अग्रवाल के साथ), मृत्युंजयी गांधी (प्रभाकर के साथ), समर्पण और साधना (जानकी देवी बजाज स्मृति ग्रंथ), गगनांचल
साहित्य अकादमी पुरस्कार, शिखर सम्मान, संस्थान सम्मान
20 फरवरी 1985
Wednesday, August 14, 2019
वो पल
साल 2008 अगस्त 16 की सुबह भी हर रोज़ की तरह सूरज की लालिमा आकाश को रोशन कर रही थी, पर पुरे गाँव में अजीब सा सन्नाटा था। आखिर आवाज होती भी कैसे गाँव के एकलौते स्कूलमास्टर मुरली बाजपाई जी का बेटा रघुवीर आने वाला था उसने वादा जो किया था की इस राखी वो छुट्टी ले कर गाँव आएगा। "रघुवीर" गाँव का सबसे शरारती लड़का जो बचपन में मुंशी जी के गल्ले में नकली चूहा रख आता था तो कभी पड़ोस की काकी के घर में लगे अमरुद के पेड़ से अमरुद तोड़ के गाँव के बच्चो में बाँट दिया करता था। उसके बताये समय पर सारा गाँव उसके घर के सामने खड़ा था, आखिर सेना में भरती होने के पुरे दो साल के बाद रघुवीर घरआने वाला था। ठीक दोपहर १ बजे चार बड़ी गाड़ियाँ मास्टर जी के घर के सामने रूकती है और पीछे से आता फूलो और तिरंगे से सजा हुआ आर्मी का ट्रक। किसी को कुछ समझ नहीं आता कि आखिर हो क्या रहा है। सारा गाँव रघुवीर से दो साल के बाद मिलने को बेताब था। जिस गाँव में आज तक सही से बिजली नहीं आ सकी वहाँ अचानक टीवी चैनल वाले अपनी गाड़ियों में आ गए। जिस गाँव को बड़े बड़े नेता पूछते भी नहीं थे वो भी आज गाँव में थे। और इन सबके बीच बाजपाई जी अपनी आँखों से आंसू को पोछते हुए गाँव वालो से कहते नज़र आये "मैंने कहा था न मेरा रघु अपने वादे से पीछे नहीं हटेगा देखो वो आ गया"
जब ट्रक से रघुवीर उतरा सारा गाँव रो दिया। गाँव का सबसे शरारती लड़का जो हर वक़्त गाँव में उछलकूद किया करता था आज वो तिरंगे में लिपटा हुआ वापस आया था। आज पहली बार था कि मुंशी जी की भी आँखों में रघुवीर को देख कर आंसू आ गए थे। हाँ शायद यही वो पल था जब बाजपाई जी और गाँव के बाकी लोग शब्दों में बयाँ नहीं कर सकते थे। - VAIBHAVRV
Tuesday, August 13, 2019
याद 2
खाते थे कसमे रखोगे संभाल के हमारे प्यार की निशानियों को अपनी आखिरी सांस तक।
कैसे बचाओगे उस सूखते दरख़्त को जहाँ लिखा था हम दोनों का नाम एकसाथ।।-VAIBHAVRV
Monday, August 12, 2019
हिंदी ज्ञानशिला 12/08/2019 सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'
पं. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जन्म सन् 1911 र्इ्र. में लाहौर के करतापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. हीरानन्द शास्त्री सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता थे। पिता का बार-बार स्थानान्तरण होने के कारण 'अज्ञेय' जी की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने फारसी और अँग्रेजी का अध्ययन घर पर ही किया । मद्रास और लाहौर से इन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। विज्ञान सनातक होने के बाद जब वे एम.ए. कर रहे थे तभी क्रान्तिकारी षड्यन्त्रों में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिए गए ओर सन् 1930 से 1934 ई. तक कारागार में रहे। बाद में एक वर्ष इन्हें घर में ही नजरबन्द रहना पड़ा। सन् 1943-1946 ई. में इनहोंने सेना में भर्ती होकर असम-बर्मा सीमा पर और युद्ध समाप्त हो जाने पर पंजाब-पश्चिमोत्तर सीमा पर एक सैनिक के रूप में सेवा की। सन् 1955 ई. में वे यूनेस्कों की वृत्ति प्राप्त कर यूरोप चले गये। सन् 1943 ई. में 'तार-सप्तक' का प्रकाशन करके हिन्दी विता में नवीन आन्दोलन चलाया। इनके उपन्यास ओर कहानियॉं उच्च कोटि की है। पत्रकार के रूप में इनहें पर्याप्त सम्मान मिला । 4 अप्रैल 1987 ई. को इनका देहान्त हो गया। वे प्रयोगवाद के प्रवर्त्तक तथा समर्थ साहित्यकार थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इनकी प्रतिभा गद्य-क्षेत्र में नवीन प्रयोगों में दिखायी देती है।
कृतियाँ-
'कविता संग्रह:-भग्नदूत 1933, चिन्ता 1942,इत्यलम्1946,हरी घास पर क्षण भर 1949, बावरा अहेरी 1954,इन्द्रधनुष रौंदे हुये ये 1957,अरी ओ करुणा प्रभामय 1959,आँगन के पार द्वार 1961, कितनी नावों में कितनी बार (1967), क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (1970), सागर मुद्रा (1970), पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (1974), महावृक्ष के नीचे (1977), नदी की बाँक पर छाया (1981), प्रिज़न डेज़ एण्ड अदर पोयम्स (अंग्रेजी में,1946)।[4]
कहानियाँ:-विपथगा 1937, परम्परा 1944, कोठरीकी बात 1945, शरणार्थी 1948, जयदोल 1951
उपन्यास:-शेखर एक जीवनी- प्रथम भाग(उत्थान)1941, द्वितीय भाग(संघर्ष)1944,नदीके द्वीप 1951, अपने अपने अजनबी 1961 ।
यात्रा वृतान्त:- अरे यायावर रहेगा याद? 1943,एक बूँद सहसा उछली 1960।
निबंध संग्रह : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मनेपद, आधुनिक साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल।
आलोचना:- त्रिशंकु 1945, आत्मनेपद 1960, भवन्ती 1971, अद्यतन 1971 ई.।
संस्मरण: स्मृति लेखा
डायरियां: भवंती, अंतरा और शाश्वती।
विचार गद्य: संवत्सर
नाटक: उत्तरप्रियदर्शी
जीवनी: राजकमल राय द्वारा लिखित शिखर से सागर तक
संपादित ग्रंथ:- आधुनिक हिन्दी साहित्य (निबन्ध संग्रह)1942, तार सप्तक (कविता संग्रह) 1943, दूसरा सप्तक (कविता संग्रह)1951, तीसरा सप्तक (कविता संग्रह), सम्पूर्ण 1959, नये एकांकी 1952, रूपांबरा 1960।
Friday, August 9, 2019
गुनाह
आज भी देता हूँ उन गुनाहों की सज़ा खुद को।
जिसमे मेरे नाम के सिवा सब तुम्हारा ही था।।
पेड़ से पतझड़ में गिरते पत्तो के जैसे।
हूँ मैं भी बिखरा ख्वाबो की ज़मीन में।।
काश के तुझे होता पता मेरे दर्द का।
तो न घोंटती गला मेरे मरते अरमानो का।।
आज भी देता हूँ उन गुनाहों की सज़ा खुद को।-VAIBHAVRV
Thursday, August 8, 2019
मैं और मेरी कविता
मेरा और कविता का रिश्ता भी बड़ा अजीब है।
यूँ तो हम साथ होते नही है।
और अगर हो भी जाये तो माँ पूछ ही लेती है।
ये तेरी ही कविता है?
अजब सा तंज होता है उनके कहने में।
मैं भी दो बार खुद से पूछ लेता हूँ, क्या सच मे ये मेरी कविता है?
और मन भी क्या जवाब दे वो खुद सोच में पड़ जाता है कि रात रात भर जिसके लिए जागा, रोज़ नए ख़्वाब बुने आज उसी के होने पर सवाल है।
उसपर मेरे हक़ पर भी कोई शक करेगा ये तो सोचा ही न था।
पर शायद दिल के किसी कोने में ये बात जरूर उठी होगी कभी।
इसीलिए तो कविता के बाद मैंने अपना नाम लिखा था।-VAIBHAVRV
बरसात 2
बरसता पानी फिर पकौड़े और चाय।
भींगा तन और सिंगड़ी की आग।।
अबके समय मे खोया ये एहसास।
सब रहते है खुद में अब कोई नही पास।।-VAIBHAVRV
Wednesday, August 7, 2019
खत 2
आज घर के कोने में कुछ शोर हुआ है।
शायद किसी ने तेरे खत छुप के निकाले है।।
रही होंगी मज़बूरियां इनकी भी ज़रूर।
वरना दराज़ों में यूं छुप के रहता कौन है।।-VAIBHAVRV
Tuesday, August 6, 2019
चन्द असरार
अपनी ख्वाहिशो को यूँ जलाया न होता ।
गर मैंने ये दिल लगाया न होता।।
हो कर बेख़बर खुद से इस ज़माने में।
ज़िन्दगी बीत रही रूठने मनाने में।।
बेख़याली ही सही रहने दे इसे।
मुझे अब तेरा वज़ूद धुंधला ही नज़र आता है।।-VAIBHAVRV
©merelafzonse
Monday, August 5, 2019
Saturday, August 3, 2019
रोटी
मुश्किल और गरीबी में भी मुझे भर पेट खिलाती थी।।
ज़ख्म भरे हाथ थे उसके पर फिर भी वो मुस्काती थी ।।
बिन डाँटे प्यार से मुझको हर बात मुझे समझती थी।
देख मुझे तक़लीफ़ में यारो वो माँ कहाँ सो पाती थी।।
खुद रहती थी भूखी मुझे भर पेट खिलाती थी।
मैंने देखा था जब वो रोटी छिपा के लाती थी।-VAIBHAVRV
Thursday, August 1, 2019
कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
-
आज ऑफिस जाते वक़्त जब घर से कार ले कर निकला ही था के कुछ दूर जाते ही कार ख़राब हो गयी। पास के गैराज में जा कर मिस्त्री को दे आया के शाम तक...
-
वो तो माँ थी जो सब सह गयी। कभी खाना पसंद का न था तो कभी पहनने को कपड़े, फिर भी वो चुप थी। ऑफिस की गुस्सा उसपर चिल्ला कर निकालना भी तुम्हे सही...
