Friday, August 15, 2025

 कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है।

कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा 


Wednesday, November 13, 2024

 यूँ तो हैँ बहुत ख़्वाहिशे लिए दिल मे, 

एक दो मुझे कहने दोगे क्या।

अकेले चलते कट गयी है जिंदिगी मेरी, अब साथ अपने चलने दोगे क्या।।

छूटे है कई हाथ सफ़र मे मेरे, आख़िरी साँस तक चलूँ साथ तेरे, ऐसा हाथ थामने दोगे क्या।। - वैभव रश्मि वर्मा 

Wednesday, February 15, 2023

 मत छोडो अकेला की तन्हारी भी महफ़िल से ज्यादा भाने लगे।

भीड़ हज़ारो की खाने लगे।

-VAIBHAV RASHMI VERMA 


Sunday, August 21, 2022

सिलवटें

 हमारे इश्क़ का वो सबूत मांगते है।

कभी लबों का मिलना कभी एक रात मांगते है।।


हम इश्क़ में खुद को मिटा देते पर 

वो हैं कि बस चादरों की सिलवटें मांगते है।।-वैभव रश्मि वर्मा

Thursday, June 23, 2022

दोस्ती

कितना अजीब होता है एक लड़के और एक लड़की के बीच दोस्ती का रिश्ता  

अजनबियों की तरह मिलते है फिर दोस्त बन जाते है, झगड़े भी हो जाते है रूठना मनाना भी हो जाता है एक दूसरे को जितना प्यार और इज़्ज़त एक दोस्त करता है न उतना कोई और नही करता

घंटो एक दूसरे से बात करने वाले दोस्त एक दिन अचानक से बात करना बंद कर देते है इसलिए नही कि झगड़ा हुआ है बल्कि इसलिए क्योंकि सामने जो दोस्त है उसकी जिंदगी में अब कोई आ गया है और उसे ये डर होता है कि कहीं उसके बात करने से उसके दोस्त की ज़िंदगी मे कोई तकलीफ न आ जाये क्योंकि हर कोई ऐसे दोस्ती के रिश्ते को समझ नही पाता।- VAIBHAV RASHMI VERMA

 कहीं खो गया था ज़िन्दगी के सफ़र में। तुमने फिर यादों के शहर में ला कर छोड़ दिया।।- वैभव रश्मि वर्मा

Wednesday, February 2, 2022

घर की बेटी

 वो बन्द कमरे में रोती थी क्योंकि वो घर की बेटी थी।

सुबह सबसे पहले उठती थी फिर बैठ आंगन में बर्तन धोती थी।

घर के कमरे हो या आंगन सबका झाड़ू पोछो वो करती थी।


जब कभी दिल था दुखता बस अकेले में रोती थी।

सबको भरपेट मिलता था खाना वो बस एक रोटी खाती थी। 


क्योंकि वो घर की बेटी थी।


बड़े भाई को नए कपड़े उसको वही पुराने वाले।

बड़े भाई को खेल खिलौने उसको झाड़ू और मकड़ी के जाले।।


बर्तन, खाना, कपड़े, झाडू उसको इसमे ही बांध दिया।

टूटा जो कोई काँच का बर्तन फिर डंडे से मार दिया।।


घर के ही कामकाज में सारा बचपन छीन लिया।

बीस बरस बीत गए पर कभी न उसको प्यार किया।


अब देखो जब शादी कर के घर वो अपने आ गयी।

माँ बाप को वही बेटी अब देखो कितना भा गयी।।


अपने किये ज़ुल्म वो भूले, अब प्यार लुटाने आ गए।

बसा बसाया घर बेटी का खुद आ कर उजाड़ गए।।


जिस बेटी को न बेटी माना न कभी था प्यार किया।

दामाद की एक डाँट पर न जाने कितना उसको प्यार दिया।।


मेरी बेटी प्यारी बेटी कह कर हक अपना जता दिया।

बिना बात के देखो कैसे कोर्ट केस में फँसा दिया।।-VAIBHAV RASHMI VERMA

Monday, December 27, 2021


अभी भी रूठने का रिवाज़ चलता है क्या।
उसकी गलती तुम्हारा मनाना चलता है क्या।।

कितनी शामें तन्हाई में गुज़ार दी।
फिर भी भीड़ में मुस्कुराना चलता है क्या।।-VAIBHAV RASHMI VERMA

Sunday, October 31, 2021

कितने ज़ख़्मो को दिल मे छिपाया है तुमने।
फिर से किसी को मोहब्बत बनाया है तुमने।।

वो था न मोहब्बत के क़ाबिल कभी, फिर भी काट दी इंतज़ार में कितनी रातें तुमने।
अब आईने को गौर से देखो ज़रा,
क्या फिर सुनी माँग को सजाया है तुमने।।

कितने दामन थामे कितने साथ छोड़ गए।
तब भी तो तन्हा थे अब भी तन्हा रह गए।।

न बारिश आंखों की रुकी न प्यास लबों की मिटती है।
तमाशा ही है जिंदगी का पिस कर ही मेहंदी रचती है।।


काश के कह पाता के सब ठीक है।
ये तो जिंदगी है कभी तीखी कभी मीठी हो ही जाती है।।

बस ये तो आंखे है जो हाल-ए-दिल बता देती है।
वरना अब ज़ुबां कहाँ कुछ कह पाती है।।-वैभव रश्मि वर्मा 
©merelafzonse

Wednesday, October 13, 2021

मुलाकातें

1.अभी इश्क़ की कई मुलाक़ात बाक़ी है।
तरसते इन होंठो की एक रात बाक़ी है।।

वो जो तन्हाई में काटी थी तुमने।
होने को वो सारी बातें बाक़ी है।।

देखो इन आँखों मे नमी रहती थी ग़म की।
तेरे होने से जाना जीने की आस बाक़ी है।।


2.कितनी रातें काटनी है तुम बिन तुम्ही बताओ न।
ज़ख्म ले सीने में कैसे मुस्कुराएं तुम्ही बताओ न।।

देखो न कि आज तन्हा अकेला हूँ हज़ारो में ऐसे।
दिल है जो ग़म-ए- दरिया तो क्या गुनगुनाऊँ मैं।।

तुम्हारी चूड़ियों की खनक से लबों पे मुस्कान होती थी।
अब तो पत्तो की सरसराहट भी चुभने लगी है।।

कितनी रातें काटनी है तुम बिन तुम्ही बताओ न।
ज़ख्म ले सीने में कैसे मुस्कुराएं तुम्ही बताओ न।।-वैभव रश्मि वर्मा

अधूरे ख़्वाब

1.ज़िंदगी थोड़ी खुशनुमा हो जाती जो तुम साथ होती।
कि देखो अब आँखों की नमी जाती ही नही जो तुम साथ नही।।
अब तो तन्हाइयां अक़्सर रुला जाती है।
हाँ जब ये फ़ैली बाहें बिन तुम्हारे सिमट जाती है।।
कैसे बताएं कि इश्क़ तो आज भी उतना ही है।
बस तुम्हारे रूठ जाने का डर कुछ कहने नही देता।।



2. कितने ज़ख़्मो को दिल मे छिपाया है तुमने।
फिर से किसी को मोहब्बत बनाया है तुमने।।

वो था न मोहब्बत के क़ाबिल कभी, 
फिर भी काट दी इंतज़ार में कितनी रातें तुमने।
अब आईने को गौर से देखो ज़रा,
क्या फिर सुनी माँग को सजाया है तुमने।।-वैभव रश्मि वर्मा


 कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा