वो बन्द कमरे में रोती थी क्योंकि वो घर की बेटी थी।
सुबह सबसे पहले उठती थी फिर बैठ आंगन में बर्तन धोती थी।
घर के कमरे हो या आंगन सबका झाड़ू पोछो वो करती थी।
जब कभी दिल था दुखता बस अकेले में रोती थी।
सबको भरपेट मिलता था खाना वो बस एक रोटी खाती थी।
क्योंकि वो घर की बेटी थी।
बड़े भाई को नए कपड़े उसको वही पुराने वाले।
बड़े भाई को खेल खिलौने उसको झाड़ू और मकड़ी के जाले।।
बर्तन, खाना, कपड़े, झाडू उसको इसमे ही बांध दिया।
टूटा जो कोई काँच का बर्तन फिर डंडे से मार दिया।।
घर के ही कामकाज में सारा बचपन छीन लिया।
बीस बरस बीत गए पर कभी न उसको प्यार किया।
अब देखो जब शादी कर के घर वो अपने आ गयी।
माँ बाप को वही बेटी अब देखो कितना भा गयी।।
अपने किये ज़ुल्म वो भूले, अब प्यार लुटाने आ गए।
बसा बसाया घर बेटी का खुद आ कर उजाड़ गए।।
जिस बेटी को न बेटी माना न कभी था प्यार किया।
दामाद की एक डाँट पर न जाने कितना उसको प्यार दिया।।
मेरी बेटी प्यारी बेटी कह कर हक अपना जता दिया।
बिना बात के देखो कैसे कोर्ट केस में फँसा दिया।।-VAIBHAV RASHMI VERMA