मेरा और कविता का रिश्ता भी बड़ा अजीब है।
यूँ तो हम साथ होते नही है।
और अगर हो भी जाये तो माँ पूछ ही लेती है।
ये तेरी ही कविता है?
अजब सा तंज होता है उनके कहने में।
मैं भी दो बार खुद से पूछ लेता हूँ, क्या सच मे ये मेरी कविता है?
और मन भी क्या जवाब दे वो खुद सोच में पड़ जाता है कि रात रात भर जिसके लिए जागा, रोज़ नए ख़्वाब बुने आज उसी के होने पर सवाल है।
उसपर मेरे हक़ पर भी कोई शक करेगा ये तो सोचा ही न था।
पर शायद दिल के किसी कोने में ये बात जरूर उठी होगी कभी।
इसीलिए तो कविता के बाद मैंने अपना नाम लिखा था।-VAIBHAVRV
Thursday, August 8, 2019
मैं और मेरी कविता
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
-
आज ऑफिस जाते वक़्त जब घर से कार ले कर निकला ही था के कुछ दूर जाते ही कार ख़राब हो गयी। पास के गैराज में जा कर मिस्त्री को दे आया के शाम तक...
-
वो तो माँ थी जो सब सह गयी। कभी खाना पसंद का न था तो कभी पहनने को कपड़े, फिर भी वो चुप थी। ऑफिस की गुस्सा उसपर चिल्ला कर निकालना भी तुम्हे सही...
No comments:
Post a Comment