Wednesday, May 2, 2018

माँ

यूँ तो है सब कुछ पास मेरे बस एक वो नही

रोज़ जब आता हूँ घर को नज़रे उसको ही ढूंढती रहती है

के काश ऐसा होता रुक जाता वक़्त उस वक़्त जब उसकी गोद मे सर रख के सोता था

सिर्फ उसके प्यार के लिए रोता था

सब छोड़ के काम वो दौड़ के पास आती थी

लगाके सीने से चुप कराती थी

माँ भी खुद को भूल हमसब के लिए जिया करती थी -VAIBHAVRV

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 कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा