यूँ तो है सब कुछ पास मेरे बस एक वो नही
रोज़ जब आता हूँ घर को नज़रे उसको ही ढूंढती रहती है
के काश ऐसा होता रुक जाता वक़्त उस वक़्त जब उसकी गोद मे सर रख के सोता था
सिर्फ उसके प्यार के लिए रोता था
सब छोड़ के काम वो दौड़ के पास आती थी
लगाके सीने से चुप कराती थी
माँ भी खुद को भूल हमसब के लिए जिया करती थी -VAIBHAVRV
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