अकेलापन
जब से रागनी ने मुझे धोखा दिया।
मैं अपने किसी भी दोस्त से मिलना नहीं चाहता था, और आज
नेहा तो मुझे ऐसे समय मिली के मैं न उससे कुछ कह पा रहा था और न उससे दूर जा पा रहा था। शायद किस्मत कुछ और खेल खेलना चाह रही थी मेरे साथ तभी तो ऑफिस की मीटिंग वो भी मेरे अपने शहर में और मुझे ही भेजा गया इसके लिए, और यहाँ आके मुझे मिलना भी था तो किस्से नेहा से मेरी वो सबसे अच्छी दोस्त थी पर अब हमारे मिलने की वज़ह ही अलग थी। इससे पहले मैं कुछ बोलता नेहा ने अपने होंठो को हलके से हिलाया और कांपती आवाज में बोला
नेहा तो मुझे ऐसे समय मिली के मैं न उससे कुछ कह पा रहा था और न उससे दूर जा पा रहा था। शायद किस्मत कुछ और खेल खेलना चाह रही थी मेरे साथ तभी तो ऑफिस की मीटिंग वो भी मेरे अपने शहर में और मुझे ही भेजा गया इसके लिए, और यहाँ आके मुझे मिलना भी था तो किस्से नेहा से मेरी वो सबसे अच्छी दोस्त थी पर अब हमारे मिलने की वज़ह ही अलग थी। इससे पहले मैं कुछ बोलता नेहा ने अपने होंठो को हलके से हिलाया और कांपती आवाज में बोला
“अरे! राज इतने दिनों बाद, कितने बदल गए हो और ये क्या अपनी दोस्त से मिलने के लिए बहाना ढूंढा भी तो
ऑफिस मीटिंग का। उसके चहरे पर मुस्कान तो थी
पर आँखों की नमी साफ़ नज़र आ रही थी। मैंने उसके सवालो को
बीच में रोकते हुए बोला “अभी ऑफिस का काम
करले जिसके लिए मैं आया हूँ।” मैं मन ही मन अपने
दर्द को समय के तराजू में तौल रहा था। पांच साल हो चुके थे
और मैं आज भी खुद को उस दर्द में भींगो रहा था। हर वक़्त अपनी पिछली जिंदगी के लिए सोचता रहता था। पर आज जब नेहा
को देखा तो उसको खुद से ज्यादा टुटा पाया, मन में कई सवाल उठने
लगे आखिर इन पांच सालो में ऐसा क्या हुआ के मेरी सबसे हँसमुख दोस्त अपनी आँखों में
अश्क लेकर मुस्कुराने की कोशिश करने लगी है।
हर वक़्त सज-सवर के रहने वाली लड़की एक
मुरझाये फूल की तरह क्यों लग रही है। बस इन्ही सवालो को मन में
दबाये मैंने अपने ऑफिस की मीटिंग ख़त्म की और वहाँ से निकलने लगा और एक पल रुक के नेहा
की तरफ मुड़ा और बोला “तुम यहाँ की बॉस हो
और इतना भी नहीं के ऑफिस आये मेहमान से एक कप कॉफ़ी के लिए भी पूंछ लेती” इस पर नेहा हँस
पड़ी और मेरे साथ ऑफिस के कैफेटेरिया की तरफ चल दी। मैंने फिर उसको टोक
दिया के “अच्छा अब मुझे ऑफिस में ही
खिला पिला के वापस भेजने का इरादा है मैडम का, मैंने सोचा था के आज हम उसी रेस्टोरेंट चलेगे जहां हमेशा
जाते थे” अब नेहा ने जब मुझे
घूर के देखा उसकी आँखों में आँसू थे ऐसा लग रहा था के अभी छलक पड़ेगे और उसने बड़ी
ही सफाई से आँसू पोछ लिए जिससे मुझे न दिखाई दे।
हम दोनों वहाँ से निकल के अपने पुराने अड्डे पर पहुँच गए जहां हम अपने कॉलेज
के दिनों में आते थे। वहाँ बैठते ही मैंने नेहा
से एक ऐसा सवाल कर दिया जो वैसे तो एक साफ़ सुथरा सवाल था पर उसके के लिए तो किसी
तीर से कम न था।
“नेहा...... वैसे जब मैं यहाँ आ रहा था तो मैंने तुम्हारा नाम केबिन के गेट पर पढ़ा ‘नेहा
राहुल व्यास’ तो मतलब हमेशा से शादी के खिलाफ रहने वाली लड़की ने भी शादी कर ली,
क्या बात है आखिर तुमको भी किसी ने बदल दिया। तो कैसी चल रही है तुम दोनों की शादीशुदा
जिंदगी???”
मेरा इतना ही पूंछना हुआ के नेहा की आँखे बह निकली जैसे
बरसो से पिंजरे में कैद कोई पंक्षी आज़ाद हुआ हो। आखिर ऐसा होता भी क्यों नहीं इन पांच सालो में
नेहा की जिंदगी ऐसे बदल गयी थी जैसे हरे-भरे खेत में अचानक से सूखा पड़ गया हो। उसके घरवालो ने उसकी शादी
उसकी मर्ज़ी के खिलाफ, समाज और खानदान की दुहाई दे कर करवा तो दी थी। पर ऐसे लड़के से जिसके लिए
नेहा सिर्फ एक लड़की थी जो उसके घर को संभालने के लिए ही लायी गयी है। जैसे नेहा उस घर की बहू या
मालकिन नहीं कोई बंधुआ-मजदूर हो दिन भर काम घर की साफ़ सफाई, खाना बनाना, सबको खाना
खिलाना और अगर कुछ वक़्त बच गया तो सास ससुर के ताने। नेहा ने अपने कॉलेज ही नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी
में भी टॉप किया था।
ऍमबीए करने के बाद उसको ऐसी जिंदगी जीनी पड़ रही थी जिसकी
कल्पना उसने कभी न की थी। उसके सपने सपने ही
रह गए थे जो उसने शादी के वक़्त देखे थे के शहर की इतनी बड़ी आईटी कंपनी मालिक के
बेटे से शादी हो रही है। अब तो ठाठ से रहेगी
पर इतने पढ़े लिखे परिवार की इतनी छोटी सोच नेहा ने ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं
सोचा थी। घर की औरते ऑफिस
में काम नहीं करती उनका काम घर को संभालने का होता है। अपना मुकद्दर मान कर नेहा सब कुछ सह रही थी के
एक दिन अचानक उसके घर एक फ़ोन कॉल आया, ऑफिस की पार्किंग से निकलते वक़्त राहुल की
कार का एक्सीडेंट हो गया है और उसको हॉस्पिटल ले कर जा रहे है।
८ घंटे के ऑपरेशन के बाद भी डॉक्टर राहुल को बचा न सके। नेहा की जिंदगी में तो
जैसे ऊपर वाले ने खुशियाँ लिखी ही नहीं। शादी को ७ महीने भी न हुए थे और ऐसा हादसा। नेहा अन्दर से टूट चुकी थी
पर शायद किस्मत में तो जैसे सिर्फ दर्द सहना ही लिखा था। अभी राहुल की मौत को 1 साल ही हुआ था की नेहा
के सास ससुर मुंबई घुमने गए थे और २६/११ का वो काला दिन और नेहा का बचा-कूचा
परिवार भी छिन गया। अब ऑफिस की
ज़िम्मेदारी अकेली नेहा के सिर पर आ गयी २५ साल की उम्र और इतनी ज़िम्मेदारी और सब
कुछ छिन जाने का दर्द सब कुछ संभालते हुए नेहा अपनी जिंदगी जी रही है। अपना अकेलापन दूर करने के
लिए नेहा एक अनाथ आश्रम से एक लड़के (अर्जुन) को गोद ले लिया था अब बस वही उसकी
जिंदगी था। आज नेहा की बहती
आँखे, थरथराते लब और लडखडाती जुबां ऐसी कहानी सुना गयी के मुझे अपना दर्द बहुत
छोटा लग रहा था। इसी बीच अपनेपन में
मेरे हाथ एकाएक नेहा की तरफ बढ़ चले। जैसे ही मेरे हाथो
ने उसके हाथो को छुआ नेहा ने एक गहरी सांस ली और फिर से सिसकते हुए रोना शुरू कर
दिया।
आज राहुल के गुज़र जाने के बाद पहली बार नेहा इतना रोई, शायद
इसीलिए की दुनिया का सबसे पाक-साफ़ रिश्ता उसके पास था, एक दोस्त जिससे वो खुल कर
अपने दिल की बात कर सकती थी। मैंने उस वक़्त नेहा
से बस इतना ही कह सका “हम बचपन से दोस्त है और हमेशा रहेगे जिंदगी में कभी खुद को
अकेला मत समझना, मैं हर वक्त हर पल तुम्हारे साथ हूँ और हाँ याद रखना ये दोस्त
अपने वादे को हमेशा पूरा करता है।” और हम दोनों उस
रेस्टोरेंट से बाहर आ गए। नेहा ने अपनी आँखे
पोछते हुए मुझसे कहा “मुझे तो तुमने रुला दिया अब ये बताओ तुम्हारी शादी हुयी या
अभी भी देवदास बने फिर रहे हो।” पर पता नहीं क्यों
अनायास ही मेरे मुँह से निकल गया “वो मेरी सबसे बड़ी भूल थी के तुम जैसी दोस्त को
छोड़ मैंने उस लड़की को चाहा, काश के मैंने तुमको चुना होता तो शायद ये अकेलापन
आज हम दोनों को न सहना पड़ता।” पर इसके बाद न मैं
कुछ बोल सका न नेहा ने कोई जवाब दिया।
VAIBHAV VERMA (VAIBHAVRV)
https://youtu.be/I9c-b_3nFfc

No comments:
Post a Comment