बेशक़ इश्क़ है बेफ़िज़ूली पर एक दफ़ा करके तो देखो
लुटाते तो सब है पैसा महबूबा पर यारो एक दफ़ा वफ़ा भी लुटाके तो देखो
ज़रूरी नही हर बार नाम मजनू सा हो जाये तेरा
कभी बिना नाम के मर कर तो देखो यारो
क्यों महबूबा के दामन में छुप जाना चाहते हो
कभी महफ़िल से नज़र मिला के तो देखो
हर बार बात रात की हो ये शालीका तो नही
कभी बात करवट की भी हो तो बात है यारो-VAIBHAVRV
Sunday, November 25, 2018
बेशक़
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कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
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