उस रात मैंने ये बात जानी
मैं अकेला निकला था न कोई अपना न पराया था साथ।
उस रात हो रही थी घनघोर बरसात
थे अकेले और उसपर खाली हाथ
भींगा बदन और ठंडी हवाओं का साथ
अनजान शहर और पैसे की आस
खो गयी थी नींद बुझ गयी थी प्यास
उस रात हो रही थी घनघोर बरसात
दूर किनारे दो लोग नज़र आये
जब पास आये तो वो मुस्कुराये
देख के मेरा पीला चेहरा वो भाँप गए
रुक कर देखते रहे मुझे जैसे रूह तक काँप गए
लाके मुझे दिया खुद के लिए बचाया खाना और पानी
तब उस रात मैंने ये बात जानी
“ न रंग न रूप न अमीरी न गरीबी
न किसी जात न धर्म की निशानी
जो वक़्त पर किसी के काम आए वही है ज़िन्दगानी” -VAIBHAVRV
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