कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है।
कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
हिंदी शायरी, हिंदी कहानी, स्वरचित रचना
हमारे इश्क़ का वो सबूत मांगते है।
कभी लबों का मिलना कभी एक रात मांगते है।।
हम इश्क़ में खुद को मिटा देते पर
वो हैं कि बस चादरों की सिलवटें मांगते है।।-वैभव रश्मि वर्मा
कितना अजीब होता है एक लड़के और एक लड़की के बीच दोस्ती का रिश्ता
अजनबियों की तरह मिलते है फिर दोस्त बन जाते है, झगड़े भी हो जाते है रूठना मनाना भी हो जाता है एक दूसरे को जितना प्यार और इज़्ज़त एक दोस्त करता है न उतना कोई और नही करता
घंटो एक दूसरे से बात करने वाले दोस्त एक दिन अचानक से बात करना बंद कर देते है इसलिए नही कि झगड़ा हुआ है बल्कि इसलिए क्योंकि सामने जो दोस्त है उसकी जिंदगी में अब कोई आ गया है और उसे ये डर होता है कि कहीं उसके बात करने से उसके दोस्त की ज़िंदगी मे कोई तकलीफ न आ जाये क्योंकि हर कोई ऐसे दोस्ती के रिश्ते को समझ नही पाता।- VAIBHAV RASHMI VERMA
वो बन्द कमरे में रोती थी क्योंकि वो घर की बेटी थी।
सुबह सबसे पहले उठती थी फिर बैठ आंगन में बर्तन धोती थी।
घर के कमरे हो या आंगन सबका झाड़ू पोछो वो करती थी।
जब कभी दिल था दुखता बस अकेले में रोती थी।
सबको भरपेट मिलता था खाना वो बस एक रोटी खाती थी।
क्योंकि वो घर की बेटी थी।
बड़े भाई को नए कपड़े उसको वही पुराने वाले।
बड़े भाई को खेल खिलौने उसको झाड़ू और मकड़ी के जाले।।
बर्तन, खाना, कपड़े, झाडू उसको इसमे ही बांध दिया।
टूटा जो कोई काँच का बर्तन फिर डंडे से मार दिया।।
घर के ही कामकाज में सारा बचपन छीन लिया।
बीस बरस बीत गए पर कभी न उसको प्यार किया।
अब देखो जब शादी कर के घर वो अपने आ गयी।
माँ बाप को वही बेटी अब देखो कितना भा गयी।।
अपने किये ज़ुल्म वो भूले, अब प्यार लुटाने आ गए।
बसा बसाया घर बेटी का खुद आ कर उजाड़ गए।।
जिस बेटी को न बेटी माना न कभी था प्यार किया।
दामाद की एक डाँट पर न जाने कितना उसको प्यार दिया।।
मेरी बेटी प्यारी बेटी कह कर हक अपना जता दिया।
बिना बात के देखो कैसे कोर्ट केस में फँसा दिया।।-VAIBHAV RASHMI VERMA
कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा