हिंदी शायरी, हिंदी कहानी, स्वरचित रचना
अभी भी रूठने का रिवाज़ चलता है क्या। उसकी गलती तुम्हारा मनाना चलता है क्या।।
कितनी शामें तन्हाई में गुज़ार दी। फिर भी भीड़ में मुस्कुराना चलता है क्या।।-VAIBHAV RASHMI VERMA
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कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
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