मैं ख़तों में क्या लिखूँ मेरा हाल तुम जानते हो।
दिल को मेरे तुम मरुधर, आँखों को बादल मानते हो।
हर बात मेरी है तुम्ही से, खत्म तुम पर ही हो रही है।
छोड़ तन्हा आज मुझको, तुम क्यों जानम रो रही हो।-वैभव रश्मि वर्मा
मैं ख़तों में क्या लिखूँ मेरा हाल तुम जानते हो।
दिल को मेरे तुम मरुधर, आँखों को बादल मानते हो।
हर बात मेरी है तुम्ही से, खत्म तुम पर ही हो रही है।
छोड़ तन्हा आज मुझको, तुम क्यों जानम रो रही हो।-वैभव रश्मि वर्मा
सिर पर वो ज़िम्मेदारी धर कर, दौड़ रहा तरकारी भर कर।
धूप में अपनी वो आँखों को मीचे, देखो दौड़ रहा है पीछे पीछे।।
बच्चे भूखे है कुछ लेलो भाई, दो दिन से न हुई कमाई।
मोल भाव मत करो भाई, सिर्फ दो पैसे की ही है कमाई।।
बीच बाजार हुई हाथापाई, छीन गयी दिनभर की कमाई।
घर पहुँचा वो जैसे तैसे, जेब मे बचे न थे उसके पैसे।।
बच्चों को खिला कर वो खाना, सो गया भूखा कर के बहाना।
कल फिर है जल्दी से उठना, दिन भर फिर है धूप में तपना।।-वैभव रश्मि वर्मा
कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा