वो ढूंढते रहे ज़माने में इश्क़ यारो थाम हाथ हमारा सरे बाज़ार
काश के देखते पलट के मुझे एक बार दिख जाता इश्क़ आंखों में बेहिसाब
बस वो तो ढूंढते रहे ज़माने में इश्क़ यारो थाम हाथ हमारा सरे बाज़ार-VAIBHAVRV
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कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
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आज ऑफिस जाते वक़्त जब घर से कार ले कर निकला ही था के कुछ दूर जाते ही कार ख़राब हो गयी। पास के गैराज में जा कर मिस्त्री को दे आया के शाम तक...
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वो तो माँ थी जो सब सह गयी। कभी खाना पसंद का न था तो कभी पहनने को कपड़े, फिर भी वो चुप थी। ऑफिस की गुस्सा उसपर चिल्ला कर निकालना भी तुम्हे सही...
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