इश्क़ का खेल भी निराला है
कोई किसी का होजाने को पागल है
कोई दूर जा के उसकी ख़ुशियाँ मांगता है
तू आँखों में उसके लिए सपने सजाता है
ये जुदाई के अश्क़ आँखों मे छुपाता है
हज़ार तारो में अकेले चांद की तरह अकेला खुद को पाता है
किसी को उस चांद में महबूबा का अक्स नज़र आता है-VAIBHAVRV
Saturday, April 21, 2018
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कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
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