Pages

Friday, April 20, 2018

दर्द-ए-दिल

न पता न खबर ज़िंदगी है किधर

ज़िंदगी है उधर आशिक़ी है जिधर

हर शाम रात में इश्क़ की बात में

इश्क़ की बात में हाथ थे हाथ में

दो कदम फिर चले चलके फिर रुक गए

जो ख़्वाब थे आंखों में वो ख़्वाब तुम बन गए

ख़्वाब तुम बन गए फिर अधूरे रह गए

अधूरे ख़्वाब बात में बस हम जी रहे

जी रहे क्या घूँट दर्द-ए-दिल पी रहे- VAIBHAVRV

No comments:

Post a Comment