Pages

Friday, August 9, 2019

गुनाह

आज भी देता हूँ उन गुनाहों की सज़ा खुद को।
जिसमे मेरे नाम के सिवा सब तुम्हारा ही था।।
पेड़ से पतझड़ में गिरते पत्तो के जैसे।
हूँ मैं भी बिखरा ख्वाबो की ज़मीन में।।
काश के तुझे होता पता मेरे दर्द का।
तो न घोंटती गला मेरे मरते अरमानो का।।
आज भी देता हूँ उन गुनाहों की सज़ा खुद को।-VAIBHAVRV

No comments:

Post a Comment