Saturday, July 7, 2018
मुस्कुराहट
आज ऑफिस जाते वक़्त जब घर से कार ले कर निकला ही था के कुछ दूर जाते ही कार ख़राब हो गयी। पास के गैराज में जा कर मिस्त्री को दे आया के शाम तक ठीक हो जायगी। सारा दिन ऑफिस के काम में लगा रहा। जब घर को निकला तो साथ में काम करने वाला राहुल भी साथ था। हम अपनी पोस्ट और पैसे की बात करते हुए जब गैराज पहुंचे तो वहाँ एक १२ साल का लड़का काम कर रहा था। वही छोटू जो हर दूकान ठेले पर काम करते मिल जाता है बस किसी भी चहरे को ले लीजिये वो भी वैसा ही था। अपने काम में व्यस्त ज़ख़्मी हाथ पर चहरे पर मुस्कराहट लिए जैसे कोई दर्द ही नही उसको। मैं और राहुल 1 घंटे तक वहाँ थे और मेरा ध्यान राहुल की बातों पर कम और उस छोटू पर ज्यादा था। एक तरफ जहां हम अपने बॉस के ज़रा से नाराज़ होने पर परेशान हो जाते है। वही वो अपने मालिक की डांट और गालियाँ सुनते हुए भी हँसता हुआ काम कर रहा था। देख कर मन में एक सवाल आया के आज कल के बच्चो को हो क्या गया है। मालिक डांट रहा है और ये हँस रहा है। फिर वही ज़ख़्मी हाथ नज़र आ जाते तो लगता के बड़ा बहादुर और सहनशील लड़का है।मन इसी उथलपुथल में था के तभी गैराज के मालिक ने आवाज दी “साहब गाडी ठीक हो गयी है एक बार चेक करलो चला कर।” गाडी चेक करी सब कुछ ठीक था। पर घर जाने की जगह उस लड़के से पहले मिला। जा कर उससे बात की तो उसके बोलने के अंदाज़ से कोई नहीं कह सकता था के १० – १२ साल का कोई लड़का बोल रहा है। बात करने पर पता चला के २ साल पहले पिता टीबी की बीमारी के कारण दुनिया छोड़ गए। और उसके बाद से वो यहाँ काम कर रहा है और १५०० रुपये महीने कमाता है। घर में माँ एक छोटा भाई और एक छोटी बहन है और घर की ज़िम्मेदारी प्रेम के ऊपर है जी हाँ प्रेम उस छोटू का नाम है प्रेम और उसकी कहानी ने उसके नाम को सिद्ध भी किया। आज मैं और राहुल को तो तनख्वाह मिली ही थी पर आज प्रेम को भी तनख्वाह मिलनी थी। आज जब गैराज के मालिक ने प्रेम को उसकी तनख्वाह दी तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उत्सुकतावश मैंने उसकी वजह पूछी तो प्रेम ने बड़े प्यार से जवाब दिया सर आज मेरी बहन का जन्मदिन है। वो सामने दूकान देख रहे है न। वहाँ एक गुडिया है जो मेरी बहन को पसंद है। मेरे पास अभी केवल २०० रुपये थे और गुडिया ४५० की है अब मालिक ने जो पैसे दिए है उन पैसे को मिला कर उसके लिए गुडिया खरीदूंगा वो बहुत खुश होगी। उसकी ऐसी बात सुन कर ऐसे लगा जैसे एक लम्बे अरसे के बाद नींद टूटी है। यहाँ हम अपनी नौकरी पैसे के आगे किसी का नहीं सोचते उल्टा खुद को काम में व्यस्त बता कर लोगो से दूरियां बना लेते है। कभी घर में माँ-बाप बीवी बच्चो के लिए सही से वक़्त ही नही निकालते। पर आज प्रेम की बातों ने मुझे फिर से जगा दिया और इस बात का अहसास कराया के जिंदगी में खुशीयाँ अपने आप नहीं मिलती है हर जगह ढूंढनी पड़ती है। खुद को खुशी तब ज्यादा होती है जब हमारी वजह से कोई अपना खुश हो। वैभव वर्मा +91 9807825061 07/07/2018
Friday, July 6, 2018
आँसू
आँसू
कल की ही बात लगती है जब अंजलि अपने माँ-बाप का घर छोड़ राजेश से शादी कर लखनऊ उसके घर आई थी। कुछ ही पल में सबकी लाडली बन गयी थी। सब को उसकी फ़िक्र रहती थी उसको क्या पसंद है क्या नहीं। अंजलि की ननद माला उसकी भी शादी कुछ दिन बाद बनारस में हो गई थी। दोनों अपने-अपने घर में खुश थी। अब शादी को ५ साल बीत चुके थे और एक दिन अचानक अंजलि के घर से फ़ोन कॉल आया के उसकी माँ की तब्यत ख़राब है। माँ-बाप की एकलौती बेटी आखिर क्या करती सारी ज़िम्मेदारियाँ संभालने को वो अपने मायके आगरा चली गयी। अभी माँ का ख़याल रखते करते हुए एक हफ्ता ही बीता था के सास प्रेमा ने वापस बुलवा लिया। अपने मन को मार अंजलि लखनऊ वापस आ गयी। पर मन तो वही अपनी माँ की फ़िक्र में उलझा रहता था। पर अब वो पहले जैसे दिन कहा जो शादी के बाद थे जब सब उसकी सोचते थे उसकी फ़िक्र करते थे। अब तो अंजलि के सिर पर तो जिम्मेदारियों का बोझ था। सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ कर बस घर के काम में लगी रहेती थी। एक दिन अचानक उसकी जिंदगी में भूचाल आ गया जब अंजलि को पता चला के उसकी माँ इस दुनिया में को छोड़ के चली गयी है। उसने प्रेमा से कई दफा कहा के उसको आगरा जाने दे पर प्रेमा को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। तभी रोते हुए अंजलि ने अपनी प्रेमा से कह दिया के अगर ऐसी हालत माला की होती तो क्या तब भी यही निर्णय होता। इसपर प्रेमा ने बहुत खरी खोटी सुनाई ‘के तू तो चाहती ही है के मैं मर जाऊं तो तुझे घर में राज करने को मिले तुझे तो मुझसे नफरत है सास जो हूँ, माँ होती तो थोड़ी ऐसे बोलती।’ पर अंजलि की बदकिस्मती तो ऐसी थी के उसका साथ ही नहीं छोड़ रही थी। एक महीने बाद ही प्रेमा की तब्यत ख़राब हो गयी। देवर और पति तो काम पर रहते ससुर की भी उम्र हो चुकी थी तो वो भी ज्यादा समय लेट कर ही गुजारते थे। माँ की तो सेवा नहीं कर पायी पर अब सास की सेवा में सारा दिन गुज़र रहा था। दो दिन बाद प्रेमा ने राजेश से माला को बुलाने को कहा पर अब समय ने अब प्रेमा को आईना दिखाने की ठान रखी थ। माला प्रेमा के पास आ तो गयी पर दो दिन बाद ही अपने घर चली गयी और जाते जाते अपनी माँ से कह गयी।
माँ अब बनारस से लखनऊ बार बार आना मुस्किल होता है, और इनको काम से छुट्टी लेनी पड़ती है। और सास भी बार-बार आने पर नाराज़ होती है। इसलिए मैं अब जल्दी नहीं आ पाऊँगी। और वैसे भी यहाँ भाभी तो है ही तुम्हारा ध्यान रखने के लिए। माला के जाने के बाद प्रेमा तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। माला की कही बात बार-बार उसके कानों में गूंज रही थी। और सोचती रही के एक तरफ घर की बहू है जिसको मैंने उसकी माँ को आखरी बार देखने तक नहीं भेजा, न उसकी माँ की स्थिति समझी न अपनी बहू की और एक तरफ मेरी खुद की बेटी है जो ऐसे शब्दों के तीर चला के गई है की दिल चीर के रख दिया। आज प्रेमा को इस बात का एहसास हो गया था के बहू तो हमेशा सास को माँ मानती है बस सास इस बात को स्वीकार्य नहीं करती के ये बहू नहीं बेटी है। थोड़ी देर बाद जब अंजलि प्रेमा के पास आई तो प्रेमा पहली बार अंजलि से लिपट के रोई और आँखों से आंसुओ की गंगा बहती रही।
वैभव वर्मा
+91 9807825061
03/07/2018
कल की ही बात लगती है जब अंजलि अपने माँ-बाप का घर छोड़ राजेश से शादी कर लखनऊ उसके घर आई थी। कुछ ही पल में सबकी लाडली बन गयी थी। सब को उसकी फ़िक्र रहती थी उसको क्या पसंद है क्या नहीं। अंजलि की ननद माला उसकी भी शादी कुछ दिन बाद बनारस में हो गई थी। दोनों अपने-अपने घर में खुश थी। अब शादी को ५ साल बीत चुके थे और एक दिन अचानक अंजलि के घर से फ़ोन कॉल आया के उसकी माँ की तब्यत ख़राब है। माँ-बाप की एकलौती बेटी आखिर क्या करती सारी ज़िम्मेदारियाँ संभालने को वो अपने मायके आगरा चली गयी। अभी माँ का ख़याल रखते करते हुए एक हफ्ता ही बीता था के सास प्रेमा ने वापस बुलवा लिया। अपने मन को मार अंजलि लखनऊ वापस आ गयी। पर मन तो वही अपनी माँ की फ़िक्र में उलझा रहता था। पर अब वो पहले जैसे दिन कहा जो शादी के बाद थे जब सब उसकी सोचते थे उसकी फ़िक्र करते थे। अब तो अंजलि के सिर पर तो जिम्मेदारियों का बोझ था। सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ कर बस घर के काम में लगी रहेती थी। एक दिन अचानक उसकी जिंदगी में भूचाल आ गया जब अंजलि को पता चला के उसकी माँ इस दुनिया में को छोड़ के चली गयी है। उसने प्रेमा से कई दफा कहा के उसको आगरा जाने दे पर प्रेमा को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। तभी रोते हुए अंजलि ने अपनी प्रेमा से कह दिया के अगर ऐसी हालत माला की होती तो क्या तब भी यही निर्णय होता। इसपर प्रेमा ने बहुत खरी खोटी सुनाई ‘के तू तो चाहती ही है के मैं मर जाऊं तो तुझे घर में राज करने को मिले तुझे तो मुझसे नफरत है सास जो हूँ, माँ होती तो थोड़ी ऐसे बोलती।’ पर अंजलि की बदकिस्मती तो ऐसी थी के उसका साथ ही नहीं छोड़ रही थी। एक महीने बाद ही प्रेमा की तब्यत ख़राब हो गयी। देवर और पति तो काम पर रहते ससुर की भी उम्र हो चुकी थी तो वो भी ज्यादा समय लेट कर ही गुजारते थे। माँ की तो सेवा नहीं कर पायी पर अब सास की सेवा में सारा दिन गुज़र रहा था। दो दिन बाद प्रेमा ने राजेश से माला को बुलाने को कहा पर अब समय ने अब प्रेमा को आईना दिखाने की ठान रखी थ। माला प्रेमा के पास आ तो गयी पर दो दिन बाद ही अपने घर चली गयी और जाते जाते अपनी माँ से कह गयी।
माँ अब बनारस से लखनऊ बार बार आना मुस्किल होता है, और इनको काम से छुट्टी लेनी पड़ती है। और सास भी बार-बार आने पर नाराज़ होती है। इसलिए मैं अब जल्दी नहीं आ पाऊँगी। और वैसे भी यहाँ भाभी तो है ही तुम्हारा ध्यान रखने के लिए। माला के जाने के बाद प्रेमा तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। माला की कही बात बार-बार उसके कानों में गूंज रही थी। और सोचती रही के एक तरफ घर की बहू है जिसको मैंने उसकी माँ को आखरी बार देखने तक नहीं भेजा, न उसकी माँ की स्थिति समझी न अपनी बहू की और एक तरफ मेरी खुद की बेटी है जो ऐसे शब्दों के तीर चला के गई है की दिल चीर के रख दिया। आज प्रेमा को इस बात का एहसास हो गया था के बहू तो हमेशा सास को माँ मानती है बस सास इस बात को स्वीकार्य नहीं करती के ये बहू नहीं बेटी है। थोड़ी देर बाद जब अंजलि प्रेमा के पास आई तो प्रेमा पहली बार अंजलि से लिपट के रोई और आँखों से आंसुओ की गंगा बहती रही।
वैभव वर्मा
+91 9807825061
03/07/2018
Monday, July 2, 2018
अकेलापन
अकेलापन
जब से रागनी ने मुझे धोखा दिया।
मैं अपने किसी भी दोस्त से मिलना नहीं चाहता था, और आज
नेहा तो मुझे ऐसे समय मिली के मैं न उससे कुछ कह पा रहा था और न उससे दूर जा पा रहा था। शायद किस्मत कुछ और खेल खेलना चाह रही थी मेरे साथ तभी तो ऑफिस की मीटिंग वो भी मेरे अपने शहर में और मुझे ही भेजा गया इसके लिए, और यहाँ आके मुझे मिलना भी था तो किस्से नेहा से मेरी वो सबसे अच्छी दोस्त थी पर अब हमारे मिलने की वज़ह ही अलग थी। इससे पहले मैं कुछ बोलता नेहा ने अपने होंठो को हलके से हिलाया और कांपती आवाज में बोला
नेहा तो मुझे ऐसे समय मिली के मैं न उससे कुछ कह पा रहा था और न उससे दूर जा पा रहा था। शायद किस्मत कुछ और खेल खेलना चाह रही थी मेरे साथ तभी तो ऑफिस की मीटिंग वो भी मेरे अपने शहर में और मुझे ही भेजा गया इसके लिए, और यहाँ आके मुझे मिलना भी था तो किस्से नेहा से मेरी वो सबसे अच्छी दोस्त थी पर अब हमारे मिलने की वज़ह ही अलग थी। इससे पहले मैं कुछ बोलता नेहा ने अपने होंठो को हलके से हिलाया और कांपती आवाज में बोला
“अरे! राज इतने दिनों बाद, कितने बदल गए हो और ये क्या अपनी दोस्त से मिलने के लिए बहाना ढूंढा भी तो
ऑफिस मीटिंग का। उसके चहरे पर मुस्कान तो थी
पर आँखों की नमी साफ़ नज़र आ रही थी। मैंने उसके सवालो को
बीच में रोकते हुए बोला “अभी ऑफिस का काम
करले जिसके लिए मैं आया हूँ।” मैं मन ही मन अपने
दर्द को समय के तराजू में तौल रहा था। पांच साल हो चुके थे
और मैं आज भी खुद को उस दर्द में भींगो रहा था। हर वक़्त अपनी पिछली जिंदगी के लिए सोचता रहता था। पर आज जब नेहा
को देखा तो उसको खुद से ज्यादा टुटा पाया, मन में कई सवाल उठने
लगे आखिर इन पांच सालो में ऐसा क्या हुआ के मेरी सबसे हँसमुख दोस्त अपनी आँखों में
अश्क लेकर मुस्कुराने की कोशिश करने लगी है।
हर वक़्त सज-सवर के रहने वाली लड़की एक
मुरझाये फूल की तरह क्यों लग रही है। बस इन्ही सवालो को मन में
दबाये मैंने अपने ऑफिस की मीटिंग ख़त्म की और वहाँ से निकलने लगा और एक पल रुक के नेहा
की तरफ मुड़ा और बोला “तुम यहाँ की बॉस हो
और इतना भी नहीं के ऑफिस आये मेहमान से एक कप कॉफ़ी के लिए भी पूंछ लेती” इस पर नेहा हँस
पड़ी और मेरे साथ ऑफिस के कैफेटेरिया की तरफ चल दी। मैंने फिर उसको टोक
दिया के “अच्छा अब मुझे ऑफिस में ही
खिला पिला के वापस भेजने का इरादा है मैडम का, मैंने सोचा था के आज हम उसी रेस्टोरेंट चलेगे जहां हमेशा
जाते थे” अब नेहा ने जब मुझे
घूर के देखा उसकी आँखों में आँसू थे ऐसा लग रहा था के अभी छलक पड़ेगे और उसने बड़ी
ही सफाई से आँसू पोछ लिए जिससे मुझे न दिखाई दे।
हम दोनों वहाँ से निकल के अपने पुराने अड्डे पर पहुँच गए जहां हम अपने कॉलेज
के दिनों में आते थे। वहाँ बैठते ही मैंने नेहा
से एक ऐसा सवाल कर दिया जो वैसे तो एक साफ़ सुथरा सवाल था पर उसके के लिए तो किसी
तीर से कम न था।
“नेहा...... वैसे जब मैं यहाँ आ रहा था तो मैंने तुम्हारा नाम केबिन के गेट पर पढ़ा ‘नेहा
राहुल व्यास’ तो मतलब हमेशा से शादी के खिलाफ रहने वाली लड़की ने भी शादी कर ली,
क्या बात है आखिर तुमको भी किसी ने बदल दिया। तो कैसी चल रही है तुम दोनों की शादीशुदा
जिंदगी???”
मेरा इतना ही पूंछना हुआ के नेहा की आँखे बह निकली जैसे
बरसो से पिंजरे में कैद कोई पंक्षी आज़ाद हुआ हो। आखिर ऐसा होता भी क्यों नहीं इन पांच सालो में
नेहा की जिंदगी ऐसे बदल गयी थी जैसे हरे-भरे खेत में अचानक से सूखा पड़ गया हो। उसके घरवालो ने उसकी शादी
उसकी मर्ज़ी के खिलाफ, समाज और खानदान की दुहाई दे कर करवा तो दी थी। पर ऐसे लड़के से जिसके लिए
नेहा सिर्फ एक लड़की थी जो उसके घर को संभालने के लिए ही लायी गयी है। जैसे नेहा उस घर की बहू या
मालकिन नहीं कोई बंधुआ-मजदूर हो दिन भर काम घर की साफ़ सफाई, खाना बनाना, सबको खाना
खिलाना और अगर कुछ वक़्त बच गया तो सास ससुर के ताने। नेहा ने अपने कॉलेज ही नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी
में भी टॉप किया था।
ऍमबीए करने के बाद उसको ऐसी जिंदगी जीनी पड़ रही थी जिसकी
कल्पना उसने कभी न की थी। उसके सपने सपने ही
रह गए थे जो उसने शादी के वक़्त देखे थे के शहर की इतनी बड़ी आईटी कंपनी मालिक के
बेटे से शादी हो रही है। अब तो ठाठ से रहेगी
पर इतने पढ़े लिखे परिवार की इतनी छोटी सोच नेहा ने ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं
सोचा थी। घर की औरते ऑफिस
में काम नहीं करती उनका काम घर को संभालने का होता है। अपना मुकद्दर मान कर नेहा सब कुछ सह रही थी के
एक दिन अचानक उसके घर एक फ़ोन कॉल आया, ऑफिस की पार्किंग से निकलते वक़्त राहुल की
कार का एक्सीडेंट हो गया है और उसको हॉस्पिटल ले कर जा रहे है।
८ घंटे के ऑपरेशन के बाद भी डॉक्टर राहुल को बचा न सके। नेहा की जिंदगी में तो
जैसे ऊपर वाले ने खुशियाँ लिखी ही नहीं। शादी को ७ महीने भी न हुए थे और ऐसा हादसा। नेहा अन्दर से टूट चुकी थी
पर शायद किस्मत में तो जैसे सिर्फ दर्द सहना ही लिखा था। अभी राहुल की मौत को 1 साल ही हुआ था की नेहा
के सास ससुर मुंबई घुमने गए थे और २६/११ का वो काला दिन और नेहा का बचा-कूचा
परिवार भी छिन गया। अब ऑफिस की
ज़िम्मेदारी अकेली नेहा के सिर पर आ गयी २५ साल की उम्र और इतनी ज़िम्मेदारी और सब
कुछ छिन जाने का दर्द सब कुछ संभालते हुए नेहा अपनी जिंदगी जी रही है। अपना अकेलापन दूर करने के
लिए नेहा एक अनाथ आश्रम से एक लड़के (अर्जुन) को गोद ले लिया था अब बस वही उसकी
जिंदगी था। आज नेहा की बहती
आँखे, थरथराते लब और लडखडाती जुबां ऐसी कहानी सुना गयी के मुझे अपना दर्द बहुत
छोटा लग रहा था। इसी बीच अपनेपन में
मेरे हाथ एकाएक नेहा की तरफ बढ़ चले। जैसे ही मेरे हाथो
ने उसके हाथो को छुआ नेहा ने एक गहरी सांस ली और फिर से सिसकते हुए रोना शुरू कर
दिया।
आज राहुल के गुज़र जाने के बाद पहली बार नेहा इतना रोई, शायद
इसीलिए की दुनिया का सबसे पाक-साफ़ रिश्ता उसके पास था, एक दोस्त जिससे वो खुल कर
अपने दिल की बात कर सकती थी। मैंने उस वक़्त नेहा
से बस इतना ही कह सका “हम बचपन से दोस्त है और हमेशा रहेगे जिंदगी में कभी खुद को
अकेला मत समझना, मैं हर वक्त हर पल तुम्हारे साथ हूँ और हाँ याद रखना ये दोस्त
अपने वादे को हमेशा पूरा करता है।” और हम दोनों उस
रेस्टोरेंट से बाहर आ गए। नेहा ने अपनी आँखे
पोछते हुए मुझसे कहा “मुझे तो तुमने रुला दिया अब ये बताओ तुम्हारी शादी हुयी या
अभी भी देवदास बने फिर रहे हो।” पर पता नहीं क्यों
अनायास ही मेरे मुँह से निकल गया “वो मेरी सबसे बड़ी भूल थी के तुम जैसी दोस्त को
छोड़ मैंने उस लड़की को चाहा, काश के मैंने तुमको चुना होता तो शायद ये अकेलापन
आज हम दोनों को न सहना पड़ता।” पर इसके बाद न मैं
कुछ बोल सका न नेहा ने कोई जवाब दिया।
VAIBHAV VERMA (VAIBHAVRV)
https://youtu.be/I9c-b_3nFfc
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कुछ मुझ सा ही मुझमे रहता है। कौन हूँ मै बस रोज यही कहता है।।- वैभव रश्मि वर्मा
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आज ऑफिस जाते वक़्त जब घर से कार ले कर निकला ही था के कुछ दूर जाते ही कार ख़राब हो गयी। पास के गैराज में जा कर मिस्त्री को दे आया के शाम तक...
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वो तो माँ थी जो सब सह गयी। कभी खाना पसंद का न था तो कभी पहनने को कपड़े, फिर भी वो चुप थी। ऑफिस की गुस्सा उसपर चिल्ला कर निकालना भी तुम्हे सही...


